
अर्जुन ने जैसे ही अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा पूरी की, उसके भीतर एक अजीब-सी आज़ादी दौड़ पड़ी थी। कुछ ही दिनों के लिए सही… पर उसे लग रहा था मानो पूरी दुनिया उसके सामने खुल गई हो। सुबह देर तक सोना, घर का खाना, दोपहर की सुस्ती, और शाम होते ही पार्क में बैडमिंटन—इन छोटी-छोटी खुशियों में उसके दिन यूँ ही फिसलते गए। रात ढलते ही वह हमेशा की तरह अपने दादा जी को दुकान से लेने मार्केट पहुँच जाता… वही पुरानी दिनचर्या, वही सुकून।
कुछ समय ऐसे ही निकल गया। पर अब रिज़ल्ट आने वाला था—बस कुछ ही दिनों में। इसी बीच ख़बर मिली कि उसके कुछ करीबी दोस्त शहर छोड़कर सीए की पढ़ाई के लिए बाहर जा रहे हैं। बात अर्जुन के मन में घर कर ही गई। उसने भी धीरे-से माता जी से कहा कि उसका मन है शहर से दूर जाकर सीए की तैयारी करने का। माता जी ने बात सुनी, पर होठों पर चिंता की लकीरें थीं—उन्होंने बस इतना कहा कि पिता जी आते हैं, उनसे बात करती हूँ।
रात आई… पिता जी लौटे… और रसोई में हल्की-सी बातचीत शुरू हुई। माता जी बोलीं कि अर्जुन भी बाहर जाकर सीए करना चाहता है। पिता जी कुछ देर खामोश रहे, फिर धीमे से बोले—“हमारे शहर में वैसे भी ऐसी कोचिंग है कहाँ…”
एक-दो दिन लगे उन्हें फैसला लेने में। मन में फ़िक्र भी थी… और बेटे की इच्छा भी।
फिर एक सुबह, सोमवार के दिन—जब शहर की दुकानें बंद रहती हैं, और सब अपने निजी काम सँभालते हैं—माता जी ने अर्जुन को नींद से झकझोर दिया।
“जल्दी नाश्ता कर लो… बाहर जाना है। तुम्हारे रहने की जगह देखनी है, कोचिंग भी। बिना सब तय किए तुम पढ़ाई कैसे करोगे?”
अर्जुन का दिल धक-धक कर उठा। वह खुश था… बहुत ज्यादा। उसे क्या पता था कि घर छोड़ने के साथ वो उन कामों से भी विदा ले रहा है, जो अब तक उसे बिना माँगे मिल जाते थे—कपड़े धुलना, खाना बनाना, रोजमर्रा की जिम्मेदारियाँ… सब कुछ अब उसके अपने हाथों में आने वाला था।
थोड़ी ही देर में तीनों बस में बैठे और सफ़र शुरू हो गया। अर्जुन खिड़की से बाहर देखते हुए अपने नए भविष्य की कल्पनाएँ बुनता रहा। उसे यह भी याद नहीं था कि स्नातक में दाख़िला लेना है—बस सीए की ही धुन चढ़ी थी।
दो-तीन घंटे बाद वे अपने गंतव्य पर पहुँचे। सीधे सीए इंस्टिट्यूट पहुँचे, जहाँ पिता जी ने पहले से ही एक जानकार से बात कर रखी थी। वह भैया—जो खुद भी वहीं सीए कर रहे थे—कुछ ही मिनट में आ गए। उन्होंने अर्जुन का इंस्टिट्यूट में पंजीकरण करवा दिया। आधा दिन बीत गया था… रहने की व्यवस्था अभी तक अधर में थी।
तभी अर्जुन को याद आया—उसका एक घनिष्ठ मित्र पहले ही इसी शहर में आ चुका है। उसने उसे फोन किया। दोस्त तुरंत आ गया… रहने की जगह भी दिखा दी, कोचिंग की जानकारी भी।
सब कुछ जैसे-तैसे ठीक हो गया।
शाम के छह बज रहे थे जब अर्जुन के माता-पिता उसे वहाँ छोड़कर अपने शहर लौट गए। विदाई के उस पल में अर्जुन का दिल थोड़ा भारी हुआ, पर चेहरे पर हिम्मत का हल्का-सा मुखौटा लगा रहा।
रात को खाना खाकर जैसे ही अर्जुन अपने कमरे की तरफ बढ़ा, पीछे से आवाज आई—
“अरे सुनो… अर्जुन!”
यह सुनील था—उसी शहर में रहने वाला उसका दोस्त।
“सुबह सात बजे तक तैयार रहना। तुम्हारा कोचिंग वाला रजिस्ट्रेशन करवाना है।”
दोनों अलग-अलग कमरों में रहते थे, इसलिए अर्जुन ने बस मुस्कराकर कहा, “ठीक है… मैं यहीं मिलूँगा।”
लेकिन मन में एक गहरी दुविधा हलचल कर रही थी—
क्या सच में सुबह उसका रजिस्ट्रेशन आसानी से हो जाएगा?
और स्नातक में दाख़िला…?
क्या वह उसकी तरफ ध्यान देगा भी या भीड़-भाड़ में यह बात कहीं दब ही जाएगी?
आने वाला कल… कुछ छुपाए बैठा था।



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