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देवर्षि नारद का आश्रय और भक्ति का बीजारोपण

श्रीमद्भागवत पुराण के वर्णन के अनुसार, जब असुर राज हिरण्यकशिपु मंदराचल पर्वत पर हजारों वर्षों की अपनी घोर तपस्या में लीन था, तब देवताओं ने इस अवसर का लाभ उठाया। स्वर्ग के राजा इंद्र के नेतृत्व में देवताओं ने असुरों की राजधानी पर आक्रमण कर दिया और उन्हें पराजित कर दिया।

इंद्र ने हिरण्यकशिपु की गर्भवती पत्नी, रानी कयाधु को बंदी बना लिया। इंद्र की योजना थी कि जैसे ही कयाधु बच्चे को जन्म देगी, वह उस शिशु का वध कर देगा, ताकि भविष्य में हिरण्यकशिपु जैसा कोई दूसरा अत्याचारी असुर उत्पन्न न हो सके।

जब इंद्र रानी कयाधु को बंदी बनाकर ले जा रहे थे, तब मार्ग में देवर्षि नारद ने उन्हें रोक लिया। नारद मुनि ने इंद्र को सत्य से अवगत कराया कि कयाधु के गर्भ में पल रहा शिशु कोई साधारण असुर नहीं है, बल्कि वह भगवान विष्णु का एक परम और निष्पाप भक्त है। देवर्षि के वचनों का सम्मान करते हुए, इंद्र ने रानी को मुक्त कर दिया और स्वर्ग लौट गए।

इसके पश्चात, नारद मुनि रानी कयाधु को सुरक्षा और आश्रय प्रदान करने के लिए अपने आश्रम ले गए। वहां कयाधु ने शांतिपूर्वक निवास किया। अपने आश्रम में, नारद मुनि प्रतिदिन रानी को भगवान विष्णु की महिमा, धर्म और भक्ति का उपदेश देते थे। वह निरंतर "ॐ नमो नारायणाय" मंत्र का जाप और श्रवण कराते थे। यद्यपि कयाधु यह सब सुनती थीं, लेकिन उनके गर्भ में पल रहे शिशु (प्रह्लाद) ने इस दिव्य ज्ञान और आध्यात्मिक शिक्षा को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया। इस प्रकार, प्रह्लाद ने अपने जन्म से पूर्व ही विष्णु के प्रति अटूट भक्ति का मार्ग अपना लिया था।

तपस्या पूर्ण होने पर जब हिरण्यकशिपु अपना अजेय वरदान प्राप्त करके विजयी होकर लौटा, तो वह अपनी पत्नी और नवजात पुत्र प्रह्लाद को सम्मानपूर्वक अपनी राजधानी ले गया।

जब प्रह्लाद विद्या ग्रहण करने योग्य हुआ, तो हिरण्यकशिपु ने उसे शिक्षा के लिए असुरों के गुरु शुक्राचार्य के दो पुत्रों—षण्ड और अमर्क—के गुरुकुल में भेज दिया। उन शिक्षकों ने प्रह्लाद को असुरों की राजनीति, कूटनीति, अर्थशास्त्र, मायावी विद्याएं और शत्रुओं को नष्ट करने के तरीके सिखाने का पूरा प्रयास किया।

हालाँकि, प्रह्लाद का मन इन सांसारिक और असुर विद्याओं से पूरी तरह विरक्त था। जब भी शिक्षकों की अनुपस्थिति होती, प्रह्लाद अपने असुर सहपाठियों को एकत्रित करता और उन्हें 'नवधा भक्ति' (भक्ति के नौ मार्ग - श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन) का उपदेश देता। उसके निर्मल उपदेशों से अन्य असुर बालकों का हृदय भी परिवर्तित होने लगा।

एक दिन जब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर पूछा कि उसने गुरुकुल में अब तक की सबसे श्रेष्ठ बात क्या सीखी है, तो प्रह्लाद ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया कि सबसे बड़ा सत्य और मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य भगवान विष्णु की भक्ति करना है। अपने ही पुत्र के मुख से अपने परम शत्रु विष्णु की महिमा सुनकर, हिरण्यकशिपु का पिता का प्रेम भयंकर क्रोध और प्रतिशोध में बदल गया।

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