
श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, जब हिरण्यकशिपु ने देखा कि उसका अपना ही पुत्र उसके सबसे बड़े शत्रु, भगवान विष्णु का परम भक्त बन गया है और अन्य असुर बालकों को भी उसी मार्ग पर ले जा रहा है, तो उसका क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने निर्णय लिया कि उसके साम्राज्य और उसकी सत्ता के लिए प्रह्लाद का जीवित रहना एक बहुत बड़ा खतरा है। अपने ही रक्त को नष्ट करने का निश्चय करते हुए, हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को प्रह्लाद का वध करने का आदेश दिया।
इसके बाद नन्हे प्रह्लाद पर क्रूरतम और प्राणघातक परीक्षाओं का एक सिलसिला शुरू हुआ।
सबसे पहले, असुर राज ने आदेश दिया कि प्रह्लाद को मदमस्त और पागल हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया जाए। सैनिकों ने प्रह्लाद को जमीन पर गिरा दिया और हाथियों को उस पर दौड़ाया, लेकिन हाथियों ने उसे कुचलने से इनकार कर दिया और उसके पास आकर शांत खड़े हो गए।
जब यह प्रयास विफल रहा, तो उसे अत्यधिक विषैले और खूंखार सांपों के एक गहरे कुएं में फेंक दिया गया। परंतु उन सर्पों ने प्रह्लाद को डसने के बजाय, अपने फनों से उसके सिर पर एक सुरक्षात्मक छत्र (छतरी) बना लिया।
असुरों ने प्रह्लाद के भोजन में प्राणघातक विष मिला दिया, लेकिन भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से वह विष प्रह्लाद के कंठ में जाते ही अमृत में परिवर्तित हो गया। जब सैनिकों ने उसे एक अत्यंत ऊंचे पर्वत के शिखर से नीचे गहरी खाई में धकेला, तो स्वयं भूदेवी (पृथ्वी माता) ने उसे एक गिरते हुए पत्ते के समान अत्यंत कोमलता से अपनी बाहों में झेल लिया।
हिरण्यकशिपु ने उसे कई दिनों तक भूखा रखा, बर्फीली हवाओं में छोड़ दिया और भारी पत्थरों से बांधकर समुद्र के तल में फिकवा दिया। लेकिन हर एक परीक्षा में, प्रह्लाद का ध्यान पूरी तरह से भगवान विष्णु पर केंद्रित रहा, और हर बार वह पूरी तरह से सुरक्षित बाहर आ गया।
अपने सभी प्रयासों को विफल होते देख, अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को एक विशेष वरदान और एक जादुई वस्त्र प्राप्त था, जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। राजा के आदेश पर लकड़ियों की एक विशाल चिता तैयार की गई। होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर उस चिता के बीचों-बीच बैठ गई। उसकी योजना थी कि वह स्वयं को उस जादुई वस्त्र से सुरक्षित रखेगी और प्रह्लाद अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा।
जैसे ही चिता में आग लगाई गई और लपटें भयंकर रूप से उठने लगीं, अचानक भगवान विष्णु की कृपा से एक बहुत तेज हवा चली। वह जादुई वस्त्र होलिका के कंधों से उड़कर नन्हे प्रह्लाद के शरीर के चारों ओर लिपट गया। देखते ही देखते होलिका उस भयंकर अग्नि में जलकर राख हो गई, जबकि प्रह्लाद अग्नि के मध्य अत्यंत शांत भाव से बैठकर 'ॐ नमो नारायणाय' का जाप करता रहा और बिना किसी खरोंच के बाहर आ गया। आज भी इसी घटना की स्मृति में, बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में 'होलिका दहन' का पर्व मनाया जाता है।



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