
श्रीमद्भागवत पुराण के वर्णन के अनुसार, जब प्रह्लाद को मारने के सभी प्रयास विफल हो गए और होलिका भी जलकर भस्म हो गई, तो हिरण्यकशिपु का धैर्य पूरी तरह से समाप्त हो गया। वह हताश और अत्यधिक क्रोधित था। उसने प्रह्लाद को अपने राजदरबार में बुलवाया।
राजसिंहासन पर बैठा असुर राज क्रोध से कांप रहा था। उसने अपनी तलवार निकाल ली और प्रह्लाद से कठोर स्वर में पूछा, "मूर्ख बालक! तू किस शक्ति के बल पर मेरी आज्ञा की अवहेलना करता है? तेरा वह भगवान कहाँ है, जिसकी तू दिन-रात रट लगाए रहता है?"
प्रह्लाद ने अत्यंत शांत और निर्भय होकर उत्तर दिया, "पिताजी, मेरी शक्ति का स्रोत वही है जो आपकी शक्ति का स्रोत है। मेरे प्रभु सर्वव्यापी हैं। वह मुझमें हैं, आपमें हैं, और इस चराचर जगत के कण-कण में विद्यमान हैं।"
यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने अट्टहास किया और दरबार के एक विशाल पत्थर के खंभे (स्तंभ) की ओर संकेत करते हुए उपहासपूर्वक पूछा, "यदि तेरा सर्वव्यापी विष्णु हर जगह है, तो क्या वह इस निर्जीव खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने दृढ़ता से कहा, "हाँ पिताजी, मेरे प्रभु इस खंभे में भी हैं।"
इस उत्तर ने हिरण्यकशिपु के क्रोध को भड़का दिया। उसने अपनी भारी गदा उठाई और पूरी शक्ति से उस पत्थर के खंभे पर प्रहार किया। खंभा एक गगनभेदी गर्जना के साथ टूट गया। उस ध्वनि से ऐसा प्रतीत हुआ मानो पूरा ब्रह्मांड कांप उठा हो।
उसी क्षण, उस टूटे हुए खंभे के भीतर से भगवान विष्णु का सबसे उग्र रूप—भगवान नृसिंह—प्रकट हुआ। यह अवतार आधा मनुष्य (नर) और आधा सिंह (शेर) का था। उनका शरीर एक विशालकाय और सुगठित मनुष्य का था, जबकि उनका सिर और पंजे एक खूंखार सिंह के थे।
भगवान नृसिंह का यह रूप ब्रह्मा जी द्वारा हिरण्यकशिपु को दिए गए अमरता के वरदान की हर एक शर्त को अत्यंत सटीकता से काटता था:
न मनुष्य, न जानवर, न देवता, न असुर: भगवान नृसिंह स्वयं नारायण का अवतार थे (आधा नर, आधा सिंह)।
न दिन, न रात: उस समय गोधूलि बेला (संध्याकाल) का समय था, जब न तो पूरी तरह से दिन होता है और न ही रात।
न घर के अंदर, न बाहर: भगवान नृसिंह हिरण्यकशिपु को पकड़कर राजमहल की दहलीज (चौखट) पर ले गए, जो न तो महल के भीतर थी और न ही बाहर।
न धरती पर, न आकाश में: उन्होंने असुर राज को उठाकर अपनी जांघों (गोद) पर रख लिया।
न अस्त्र, न शस्त्र, न निर्जीव वस्तु: भगवान नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए किसी हथियार का उपयोग नहीं किया, बल्कि अपने शरीर के अत्यंत नुकीले नाखूनों से उसकी छाती चीर दी।
इस प्रकार, ब्रह्मा जी के वरदान का पूर्ण रूप से मान रखते हुए, भगवान नृसिंह ने उस अत्याचारी असुर का अंत कर दिया। हिरण्यकशिपु की मृत्यु के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध इतना प्रचंड था कि देवता और स्वयं ब्रह्मा जी भी उनके पास जाने से डर रहे थे।
तब देवताओं के अनुरोध पर, नन्हा प्रह्लाद निडर होकर आगे बढ़ा और भगवान नृसिंह के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। अपने परम भक्त की निश्छल प्रार्थनाओं को देखकर भगवान नृसिंह का क्रोध तुरंत शांत हो गया। उन्होंने वात्सल्य भाव से प्रह्लाद को उठाया और उसे अपना आशीर्वाद दिया। इसके पश्चात, प्रह्लाद को असुरों का न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ राजा घोषित किया गया।



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