
अगली सुबह सूरज निकलते ही बड़ा भाई, आकाश, काम की तलाश में गाँव के बीचों-बीच (बाज़ार) पहुँच गया। उसने कई लोगों से काम मांगा, लेकिन दोपहर के 3 बज जाने तक उसे कहीं भी कोई काम नहीं मिला। खाली पेट और थकान से उसकी उम्मीदें टूटने लगी थीं।
लेकिन करीब 4 बजे उसकी किस्मत ने साथ दिया। उसे गाँव की एक परचून (जनरल मर्चेंट) की दुकान पर काम मिल गया। आकाश ने बिना कोई समय बर्बाद किए तुरंत काम शुरू कर दिया। उसने अपने छोटे भाई, अर्जुन को भी जानकारी दी और उसे वहीं बुला लिया ताकि वह भी उसी जगह पर काम कर सके।
अब दोनों भाइयों के पास काम था और वे अपनी मेहनत से अपने लिए खाने का जुगाड़ करने लगे। उन्होंने उस परचून की दुकान पर पूरे 3 हफ़्तों तक काम किया।
इन तीन हफ्तों की कमाई से उन्होंने न सिर्फ अपना पेट पाला, बल्कि अपने आगे के सफर के लिए पूरे 2 हफ़्तों का भोजन भी इकट्ठा कर लिया। जब उनके पास पर्याप्त राशन जमा हो गया, तो उन्होंने वह गाँव छोड़ दिया और नक्शे के सहारे खजाने की अपनी तलाश में फिर से आगे बढ़ गए।
अपनी यात्रा पर लगातार चलते हुए, डेढ़ हफ़्ते के सफर के बाद, दोनों भाई अब लगभग उस सटीक जगह पर पहुँच चुके थे जहाँ नक्शे के अनुसार वह खजाना छिपा हुआ था।



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